रेपो रेट मौद्रिक नीति (Monetary Policy) का एक आधार स्तंभ है, जो देश की वित्तीय व्यवस्था को गहराई से प्रभावित करता है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इस दर के ज़रिए अर्थव्यवस्था को स्थिर व दिशा प्रदान करता है।
यह लेख रेपो रेट की परिभाषा, प्रक्रिया, और इसके उपभोक्ताओं एवं व्यापारों पर पड़ने वाले प्रभाव को सरल भाषा में समझाता है।
रेपो रेट क्या है?
रेपो रेट (Repurchase Rate) वह ब्याज दर है जिस पर केंद्रीय बैंक, जैसे RBI, वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक आवश्यकता हेतु ऋण देता है। आमतौर पर यह ऋण सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) के बदले दिया जाता है।
- ऋण प्रक्रिया: जब बैंकों को नकदी की कमी होती है, वे RBI से आसान शर्तों पर निर्धारित रेपो रेट पर कर्ज लेते हैं।
- प्रतिभूतियाँ गारंटी: बैंक, RBI को सरकारी बांड्स गिरवी रखते हैं जिस से ऋण सुरक्षित रहता है।
- पुनर्खरीद समझौता (Repurchase Agreement): ‘रेपो’ का अर्थ ही है पुनर्खरीद। निर्धारित अवधि के बाद, बैंक इन प्रतिभूतियों को ब्याज समेत RBI से पुनः प्राप्त करता है।
रेपो रेट किस प्रकार काम करता है?
- उधारी की शुरुआत: बैंक RBI से अपनी जरूरत और प्रतिभूतियाँ बताकर फंड मांगता है।
- RBI की प्रक्रिया: RBI प्रतिभूतियों का आकलन करता है और रेपो रेट पर धन देता है।
- ब्याज गणना: ब्याज की गणना उधार राशि पर रेपो रेट से होती है।
- प्रतिभूतियों की पुनर्खरीद: तय समय बाद बैंक प्रतिभूतियाँ ब्याज समेत पुनः खरीदता है।

रेपो रेट का महत्व
- महंगाई नियंत्रण: रेपो रेट बढ़ाने से बैंक ऋण लेना महंगा होता है, जिससे बाजार में नगदी घटती है और महंगाई कम होती है।
- आर्थिक प्रोत्साहन: रेपो रेट घटाने से ऋण लेना सस्ता होता है, जिससे बाजार में नगदी बढ़ती है और आर्थिक गतिविधियाँ तेज होती हैं।
- तरलता प्रबंधन: रेपो रेट बदल कर RBI बैंकिंग सिस्टम में liquidity यानी नगदी की उपलब्धता को नियंत्रित करता है।
उपभोक्ताओं पर रेपो रेट का प्रभाव
- लोन की ब्याज दरें: रेपो रेट का सीधा असर लोन की ब्याज पर पड़ता है। रेपो रेट बढ़ने पर लोन महंगे और घटने पर सस्ते हो जाते हैं।
- बचत और निवेश: उच्च रेपो रेट पर बैंक सेविंग स्कीम्स (जैसे FD) पर अधिक ब्याज देते हैं।
- होम लोन/EMI: फ़्लोटिंग रेट लोन की EMI सीधा रेपो रेट से प्रभावित होती है।
व्यवसायों पर रेपो रेट का प्रभाव
- ऋण लागत: रेपो रेट बढ़ने पर व्यापारिक ऋण महंगे हो जाते हैं, जिससे विस्तार योजनाएँ रुक सकती हैं।
- कैश फ्लो: ब्याज दर बढ़ने से कंपनियों के नकदी प्रबंधन की योजना बदल जाती है।
- निवेश निर्णय: कम रेपो रेट पर कंपनियां नए निवेश/परियोजनाओं के लिए प्रेरित होती हैं।
निष्कर्ष:
रेपो रेट केवल एक ब्याज दर नहीं, बल्कि पूरी आर्थिक प्रणाली को संतुलित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसका असर आम नागरिक, बैंक और व्यापार— सभी पर पड़ता है।